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वेद व हिन्दू पुस्तकों में जातिवाद का कोई स्थान नही
ओ.पी. गुप्ता, फिनलैड मे भारत के राजदूत
इससे संबंधित एक दूसरी परिकल्पना भी है। श्री राम शर्मा ने इसी श्लोक का हिंदी मे अनुवाद किया है कि- यज्ञ से एक विराट पुरुष का अविर्भाव हुआ। विराट पुरुष कितने प्रकारो से उत्पन्न हुए। उनकामुख ब्राह्मण, भुजाएं क्षत्रिय,जंघाएं वैश्य और चरण शूद्र हुए। आचार्य ने इन दोनो ऋचाओ का अनुवाद सकारात्मक विचार को ध्यान मे रखते हुए किया है जबकि पश्चिमी इतिहासकारो ने इन्हीं ऋचाओ का वर्ण विभाजन के अर्थ मे नकारात्मक अनुवाद किया है। इसीलिए श्रीराम शर्मा के अनुवाद मे ब्रह्मा के शरीर को चार टुकड़ो मे विभाजित नही किया गया है बल्कि लिखा है कि उसकी उत्पत्ति यज्ञ से हुई है। एक विराट पुरुष का मतलब ऐसा व्यक्ति होता है जो शारीरिक स्तर पर खूब मजबूत हो, और ऐसा तभी होगा जब उसका मुख, बाहू, जंघा और पैर शरीर से जुड़ा हो और एक- दूसरे के साथ तालमेल से काम करे। यदि शरीर के किसी अंग मे कोई खराबी आ जाए, या ठीक से काम न करे तो व्यक्ति बीमार हो जाता है फिर वह विराट पुरुष नही रह जाता। विराट पुरुष को राष्ट्र या समाज का प्रतिमान मानते हुए ऋषि नारायण ने इस ऋचा की व्याख्या कुछ इस तरह किया है- एक देश या समाज विराट पुरुष के रूप मे तभी स्थापित हो सकता है जब उस समाज के प्रबुद्धवर्ग(ब्राह्मणो), प्रशासन (राजन्य), व्यापारी वर्ग (वैश्य) और श्रमिक वर्ग (शूद्र) सब मिलकर रहे और ठीक उसी तरह तालमेल से काम करे जैसे शरीर मे मुख, बाहू, जंघा और पैर। इस तरह ऋग्वेद की यह दोनो ऋचाएं समाज मे संपूर्ण समानता, एकता को एक शक्तिशाली समाज के लिए जरूरी मानती है। किसी स्वस्थ व्यक्ति के शरीर के विभिन्न अंगो के बीच उनके महत्व को लेकर विवाद या बहस नही हो सकता है। ऐसे ही यदि किसी का बाहू उसके मस्तिष्क से अलग काम कर रहा है तो इसे बीमारी(पार्किसन रोग) का लक्षण माना जाएगा। मतलब यह कि शरीर का कोई भी अंग किसी अंग से न तो अधिक या कम जरूरी है ना ही अधिक या कम महत्वपूर्ण। शरीर के सभी अंग एक-दूसरे पर निर्भर हैं तथा एक-दूसरे का पूरक और सहायक है। इस तरह से यदि ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के हवाले जातिवाद से संबंधित बात की जाए तो उसके अनुसार- समाज के चारो वर्णो मे से कोई भी निकृष्ट या उत्कृष्ट नही है, तथा इनकी बेहतरी के लिए यह जरूरी है कि वे एक-दूसरे से तालमेल बनाकर काम करे। जबकि स्वार्थी तत्वो के साथ-साथ ब्रिटिश न्यायालय द्वारा इन दोनो ऋचाओ का इससे ठीक विपरीत अर्थ प्रचारित किया जाता रहा है, ताकि हिंदुओ को बांटा जा सके और देश पर अंग्रेजो का शासन कायम रहे।
यदि शूद्रो को ब्रह्मा का पैर ही माना जाए तो ब्रह्मा के पैर से संबंधित ऋग्वेद की (10.90.14) ऋचा को पढ़ना चाहिए जो निमन्लिखित है-
नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीष्र्णो द्यौ: समवर्तत।
पद्भयां भूमिर्दिश: श्रोत्रात्तथा लोकॉं अकल्पयन्॥14॥
जो लोग यह कहते है कि शूद्रो की उत्पत्ती ब्रह्मा के पैर से होने के कारण ये अशुद्ध हैं तो ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा के अनुसार ब्रह्मा के पैर से पृथ्वी की भी उत्पत्ती हुई है। ऐसे मे तो शुद्रो को अशुद्ध मानने वालो को पूरी पृथ्वी को ही अशुद्ध मान कर संसार छोड़ देना चाहिए। जबकि इसी ऋचा के आधार पर शूद्रो को पूरी धरती पर अधिकार का दावा करना चाहिए। यह कैसी विडंबना है कि मंदिरो मे तो सनातनी हिंदू भगवान के पैर को स्पर्श कर उनकी वंदना को सर्वोत्तम मानते है जबकि भगवान के उसी पैर से उत्पन्न शूद्रो से घृणा करते है और उन्हे अस्पृश्य और अशुद्ध मानते है?
ऋग्वेद मे जन्म के आधार पर जाति का निर्धारण का प्रावधान नही है। ऋग्वेद के अनेक ऋषियो(रचनाकारो) को आज के मनुस्मृतिय मानदंडो के आधार पर देखा जाए तो वे जन्मना ब्राह्मण नही कहे जा सकते। ऋग्वेद मे ऐसा कोई प्रावधान नही है जिसके तहत पुत्र भी वही व्यवसाय अपनाए जो उसके पिता का हो। ऋग्वेद के (5.23.1) तथा (5.23.2) वी ऋचा मे ऋषि द्युमन् ने अग्नि से यह प्रार्थना की है कि उनका पुत्र ऐसा योद्धा हो जो युद्ध मे सभी को पराजित कर सके। (9.113.2) वी ऋचा मे एक अन्य ऋषि कहते है कि- मै संगीतकार हूं, मेरेपिता चिकित्सक है और मामा श्रमिक। अर्थात एक ऋग्वैदिक ब्राह्मण का पिता चिकित्सक हो सकता था जबकि मनुस्मृति की परिभाषा के तहत चिकित्सको को शूद्र की श्रेणी मे डाल दिया गया है। ऋग्वेद की ऋचा सं. 10.125.5 मे एक ऋषि कहते है कि- सतत प्रशिक्षण के द्वारा कोई भी व्यक्ति योद्धा, ब्राह्मण, ऋषि या महर्षि बन सकता है। यानी ऋग्वैदिक समाज मे व्यवसाय न तो जाति पर आधारित था ना ही आनुवशिक। यह पूरी तरह प्रशिक्षण(कर्म, प्रयास और प्रयत्न)पर आधारित था।
अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत: मानुषेभि:।
यं कामये तंतमुगन्ं कृणोमि तं ब्राह्मणं तमृषिं सुमेधाम्॥5॥
उपर्युक्त ऋचा का अनुवाद एचएच विल्सन ने कुछ इस प्रकार किया है- मै यह घोषणा करता हूं, जिसकी पुष्टि देवता और मानव करते है कि मै किसी भी व्यक्ति को ब्राह्मण, ऋषि या महर्षि बना सकता हूं। ऋग्वेद की ऋचा (10.98.7)मे ऋषि देवापी की कहानी है जो महाभारत के प्रसिद्ध राजा शांतनु के भाई है। मनुस्मृति के प्रावधानो के तहत यह असंभव है कि एक राजा का भाई पुरोहित हो जबकि वैदिक मान्यताओ के तहत यह संभव है। ऋग्वेद की ऋचाओ से यह भी पता चलता है कि ऋषि प्रतिर्दन काशी का राजा था। विदर्भ नरेश की पुत्री क्षत्रिय होने के बावजूद ऋषि थी जिनकी शादी अगस्त्य ऋषि से हुई थी।
ऋग्वेद के तीसरे मंडल मे ऋषि विश्वमित्र एवं उनके परिवार की कहानी है। ऋग्वेद के (3.58.6) वी ऋचा मे कान्यकुब्ज के राजा जाहुनू के साथ पारिवारिक संबंध का खुलासा किया गया है। गायत्री मंत्र ऋषि विश्वामित्र के समक्ष प्रकट हुआ था जिसका वर्णन सामवेद और यजुर्वेद मे है। जबकि विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे। ऋग्वेद मे ही ऋषि पायू भारद्वाज को भी महान योद्धा बताया गया है। महाभारत काल मे ब्राह्मण होने के बावजूद परशुराम, द्रोणाचार्य और कृपाचार्य कितने महान योद्धा थे यह हम सब जानते है।
कुछ लोगो का यह कहना है कि आर्य रंग से गोरे थे जबकि शुद्र काले रंग के। उनका यह दावा है कि चारो वर्णो का निर्धारण भी उनके रंग के आधार पर ही किया गया है। तो क्या यह सत्य नही है कि राम और कृष्ण को श्याम वर्ण का कहा गया है, यहां तक कि तस्वीरो मे उन्हे इसी वर्ण का दिखाया गया है। वेदो के संकलनकर्ता ऋषि वेदव्यास खुद काले रंग के थे। इतना ही नही ऋग्वेद की रचना मे अपना बड़ा योगदान देने वाले महर्षि कण्व भी काले थे।
उत कण्व नृषद: पुत्रमाहुरुत श्यावो धनमादत्त।
प्र कृष्णाय रुशदपिन्वतोधर्ऋतमत्र नकिरस्मा अपीपेत॥11॥
इसी तरह यह प्रचारित किया जाता है कि आर्यो के आगमन के बाद अनार्यो को जबरदस्ती दक्षिण मे भेज दिया गया। जबकि ऋग्वेद या द्रविडि़यन साहित्य कही भी किसी को जबरदस्ती दक्षिण भेजे जाने का वर्णन नही है। जबकि कुछ इतिहासकार यह साबित करने मे पतले हुए जा रहे है कि 1500 ई.पू. के आसपास गोरी चमड़ी वाले आर्यो ने काली चमड़ी वाले अनार्यो को पराजित कर दक्षिण की ओर भगा दिया। ऐसे इतिहासकर यही रुक नही जाते, वे यह भी प्रतिपादित करते है कि आर्यो के आने से पहले द्रविडि़यन भी भूमध्यसागरीय क्षेत्र से आये थे। द्रविड़ शब्द ऋग्वेद के तीसरे मंडल की 61.6 वी ऋचा मे आया है लेकिन यहां इसका प्रयोग खजाना या समृद्धि के रूप मे हुआ है। अथर्ववेद मे भी द्रविणा शब्द आया है जिसका मतलब धन/संपत्ति है। यह जाहिर है कि कोई भी समाज अपने धनी सदस्यो को बहिष्कृत नही करता है, तो फिर ऋग्वेदिक लोग इस सामान्य व्यवहार के विरुद्ध क्यो आचरण करते? यह तथ्य भी आर्यो के विजय के पाश्चात्य सिद्धांत को खारिज करता है।
तारी दिवो अर्कैरबोध्या रेवती रोदसी चित्रमस्थात्।
आयतीमग्न उषसं विभाती वाममेषि द्रविणं भिक्षमाण:॥ 6॥
आर्यो के विजय के पाश्चात्य सिद्धांत को प्रतिपादित करने वाले समूह मे सबसे प्रमुख नाम मैक्समूलर का है। ईस्ट इंडिया कंपनी इन्हे पर्याप्त तनख्वाह देती थी ताकि वह ऐतिहासिक तथ्यो द्वारा यह साबित करे कि प्राकारांत से हिंदू भी भारत के मूल निवासी नही है ताकि भारतीयो की राजनैतिक स्वतंत्रता मांगने का बौद्धिक आधार खत्म हो जाए। इस सिद्धांत के प्रतिपादन के पीछे साम्राज्यवादी इतिहासकारो की यह मंशा थी कि इस सिद्धांत के बिना पर भारत मे अंग्रेजो को भी हिंदुओ के इतना ही राजनैतिक अधिकार मिल जाएगा। इसके बावजूद, मैक्स मूलर ने यह प्रशस्ति दी कि रंग चाहे जो हो, आर्य वही है जो आर्यो की भाषा बोलते है और उनके व्याकरण को उपयोग मे लाते है। ऋग्वेद के अनुसार आम लोगो मे शिक्षित और श्रेष्ठ व्यक्ति ही आर्य है।
ऊंची जाति- नीची जाति, जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता के मुद्दे के विरोध में ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद मे काफी तथ्य भरे पड़े है, जो अनेकता मे एकता वाले हमारे भारतीय पहचान को सिद्ध करता है। अनेकता मे एकता को सिद्ध करने के लिए वेदो मे उदाहरण दिया गया है कि जिस तरह विभिन्न रंगो की गाये एक समान दूध देती है ठीक उसी तरह तथ्यो मे विभिन्नता होने के बाद भी इनका उद्देश्य एक ही है। ऋग्वेद के दसवे मंडल की 191.2 ऋचा मे कहा गया है कि हम सब एक साथ रहे, साथ बातचीत करे, हम सब अपनी बुद्धि को एक दिशा मे लगाएं ठीक उसी तरह जैसे देवता लोग एक साथ मिल-बैठकर अपने-अपने हिस्से की हवि (यज्ञ मे अर्पित खाद्य पदार्थ)को ग्रहण करते है।
सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे स†जानाना उपासते॥2॥
ऋग्वेद की ऋचा सं. 191.3 का भावार्थ भी कुछ इसी तरह का है। जैसे- हमारे पूजा स्थल एक हो हमारी जरूरते भी समान हो इसी तरह हमारे उद्देश्य भी एक-दूसरे से मिलते हो तथा हमारी इच्छाओ की पूर्ति करने वाला हो। अत: आम लोगो के लिए मै एक प्रार्थना करता हूं।
समानो मंत्र:समिति: समानी समान मन: सह चित्तमेषाम्।
समानं मंत्रमभि मंत्रये व: समानेन वो हविशा जुहोमि॥ 3॥
एक अन्य ऋचा का भावार्थ भी इसके समान ही है- हमारे उद्देश्य(इच्छाएं) सबसे मिलते हो, हमारे विचारों का भी एक-दूसर से मेल हो ताकि हम आपस मे संगठित रहे।
समानी व आकृति: समाना हृदयानी व:।
समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति॥ 4॥
सामवेद की निम्नलिखित ऋचा का डब्ल्यू डी ह्विटनी और के एल जोशी ने अनुवाद करते हुए लिखा है कि मैने आप लोगो के लिए समान विचार, आपसी भाईचारा तथा आपसी समरसता की कल्पना की है, क्या आपलोग ठीक उसी तरह एक दूसरे से प्यार कर सकते है जैसे गाय आपने बछड़े से करती है।
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि व:।
अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाध्न्या॥1॥
अथर्ववेद मे ऐसे अनेक उदाहरण भरे पड़े है। ऋचा स. 30.6 के अनुसार आपके पानी पीने का स्थान एक हो तथा आप भोजन भी एक साथ ही ग्रहण करे तथा मै भी उसमे सम्मिलित होऊंगा। इसके अनुसार दलित हिंदुओ को वेद की तरफ से ही समानता का अधिकार, जैसे एक ही स्थान से पानी पीने, खानेपीने की दुकान तथा मंदिरो का उपयोग करने की छूट मिली हुई है।
समानी प्रपा सह वोऽन्नभाग: समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि।
सम्य†चोऽग्निं सपर्यतारा नाभिविाभित:॥6॥
अथर्ववेद यह भी कहता है कि समन विचारो वाले व्यक्ति एक समूह मे संगठित हो ठीक उसी तरह अमृत की रक्षा मे सारे देवता संगठित हो गए थे। अर्थात सभी हिंदू चाहे वह जाति या वर्ण से कुछ भी हो एक है। और हिंदू समाज के इसी समष्टि के मद्देनजर यजुर्वेद मे भी इनके कल्याण की कामना किया गया है-
यथेमां वाचं कल्याणी मावदानि जनेभ्य:।
ब्रह्मराजन्याभ्या शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च॥
प्रियो देवानां दक्षिणायै दातुरिह भूयासमयं मे काम: समृध्यतामुप मादो नमतु॥2॥
आरटीएच ग्रिफिथ और डा. रवि प्रकाश आर्य के अनुसार यजुर्वेद यह पक्का करता है कि चाहे कोई व्यक्ति शूद्र हो या अनार्य वह हिंदू ही है। इतना ही नही वह हिंदुओ के उसी नस्ल के है जिससे पुरोहितो क्षत्रियो या आर्यो का संबंध है। यानी शूद्र हिंदू से कोई अलग प्रजाति नही है। डा. आंबेडकर भी इस बात पर हमेशा जोर डालते थे। उनके अनुसार जाति व्यवस्था एक नस्ल के लोगो को अलग-अलग सामाजिक वर्ग मे बांटने की जालसाजी है। श्री राम शर्मा के अनुसार यजुर्वेद मे यह कहा गया है कि-कल्याण करने वाली वाणी को ब्राह्मण, राजा, शूद्र और वैश्य, अपने जनो और समस्त जनो के लिए कहता हूं। हे देव मुझे शक्ति प्रदान करे। आपकी कृपा से लोग मुझे अपनो के प्रिय के रूप मे पहचाने।
अर्थात वैदिक ऋचाओ का सार यही है कि सभी हिंदू एक गुच्छ के की तरह जन्मना समान है, तथा उन्हे अन्य हिंदुओ के समान ही भोजनालय, जलाशय,मंदिर के अपयोग की स्वतंत्रता है। इसके साथ-साथ उन्हें समान स्तर का वैचारिक स्तर तथा सोच की भी स्वतंत्रता है। वेद मे साफ-साफ यह लिखा गया है कि निरंतर प्रशिक्षण और प्रयास से कोई भी व्यक्ति पंडित, राजा या महर्षि बन सकता है। इसके लिए किसी जाति से संबद्ध होने की जरूरत नही है। न तो कोई जेष्ठ है न कोई कनिष्ठ सभी आपस मे भाई-भाई है।
अजेष्ठासो अकनिष्ठास एते सं भ्रातरो वावृधु: सौभागाय।
युवा पिता स्वपा रूद्ग एषां सुदुघा पुश्नि: सुदिना मरूद्भय:॥5॥
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(लेख मे व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार है। इससे भारत सरकार को कोई लेना देना नही है।)
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