सती प्रथा का निषेध करता है वेद
 
 
गो मांस: वेद, चिकित्सा विज्ञान और भ्रांतियां
 
 
वेद व हिन्दू पुस्तकों में जातिवाद का कोई स्थान नही
 
 
श्रीमद् भागवत गीता भी जात-पात का निषेध करता है
 
 
वेद और हिंदू धर्मशास्त्रो द्वारा जातिवाद का निषेध
 
 
   
सती प्रथा का निषेध करता है वेद
ओ.पी. गुप्ता, फिनलैड मे भारत के राजदूत

2002 के अगस्त-सितंबर महीने में मीडिया मे एक महिला के सती होने की एक घटना के साथ ही इसी तरह के प्रयासों की दो रिपोर्टे सामने आयीं थी। इसी बीच राजस्थान से यह खबर भी आई कि राजस्थान हाईकोर्ट ने झुंझुनू जिले में स्थित रानी सती मंदिर में लोगों को प्रार्थना करने की इजाजत दी है। लेकिन इसके साथ ही वहां पर पर्चा वितरण और किसी मेले या चुनरी समारोह के आयोजन पर अंतिम फैसला आने तक रोक लगा दी है। अगस्त 2003 में राजस्थान उच्च न्यायालय ने प्रदेश सरकार से वहां पर किसी भी मेले के आयोजन पर सख्ती से रोक लगाने को कहा था। साथ ही इसका कड़ाई से पालन करने का आदेश दिया था। कुछ लोगों का मानना है कि ऋग्वेद के दसवे मंडल के 18वें सूक्त की 7वी ऋचा मे (10.18.7) किसी हिंदू विधवा के अपने मृत पति की चिता के साथ सती हो जाने का प्रावधान है। यह लेखक इससे सहमत नही है। एक वेबसाइट मे पीवी कांणे द्वारा इस ऋचा के किए गए अनुवाद में बताया गया है कि ''उन महिलाओं को, जिनके पति पूरे तौर पर सक्षम होने के साथ ही जीवित है, को अपने घरों में अपनी आंखों मे घी का काजल लगाकर प्रवेश करना चाहिए। इन पत्नियों को बिना किसी दुख या भय के पूरे खुशी मन से अपने पति की चिता पर जाकर बैठ जाना चाहिए।'' कोई भी इस बात पर गौर कर सकता है कि इस अंग्रेजी अनुवाद में भी साफ तौर पर यह नही कहा गया है कि विधवाओं को अपने पति की चिता में समाहित हो जाना चाहिए। इस अनुवाद में केवल यही कहा गया है कि इन पत्नियों को चिता पर बैठ जाने दो। सामान्य ज्ञान के अनुसार किसी महिला के पति की मौत होने के तुरंत बाद से ही उसे विधवा कहा जाने लगता है न कि उसे पत्नी कहकर संबोधित किया जाता है। इसलिए कांणे के अनुवाद मे उद्धृत 'इन पत्नियो' को विधवा से नहीं जोड़ा जा सकता है।
वास्तव में 18वें सूक्त में हिंदू विधवाओं के अपने सामान्य जीवन में लौटने की बात कही गई है। उन्हें अपने घरो में अपने बच्चों एवं पोते-पोतियो के साथ सानंद जीवन बिताने को कहा गया है। ऋग्वेद में कहा गया है कि मृत पति की सारी संपत्ति की मालिक उसकी पत्नी होगी। 18वे सूक्त की सभी 14 ऋचाओं का अध्ययन करने के बाद ही 10.18.7 वीं ऋचा का सही अर्थ समझा जा सकता है। तीसरी ऋचा में कहा गया है कि जो लोग जिंदा है वे मृतकों से अलग हो जाये। (एचएच विल्सन द्वारा लिखित ऋग्वेद संहिता और रविप्रकाश एवं के के जोशी द्वारा संपादित भाष्य ऑफ सायना के मुताबिक)। डा. वेडी डी ओ फ्लैहेर्टी ने अपनी किताब ऋग्वेद में कहा है कि जो लोग जिंदा है अब वे मृतकों से अलग हो जाए। रैल्फ टीआर ग्रिफिथ ने अपने अनुवाद में कहा है कि मृतकों से अलग वे लोग है, जो जिंदा है। बरेली के श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपनी हिंदी की पुस्तक ऋग्वेद में कहा है कि मृतक के पास से जीवित मनुष्य लौट आवे। डा. गंगा सहाय शर्मा, पीएचडी ने अपनी पुस्तक ऋग्वेद में बताया है कि ये जीते हुए लोग मरे हुए व्य1ितयो के पास से लौट आवे। मृतकों को पीछे छोड़ आने या उनसे अलग होने का ऋग्वेद का यह प्रावधान हिंदू विधवाओं के ऊपर भी उसी तरह से लागू होता है क्योंकि विधवा महिलाएं भी जीवित प्राणी होती है।
इमा नारीरविधवा: सुपत्नीरांजनेन सर्पिषा सं विशन्तु।
अनश्रवोनमीवा: सुरत्ना आ रोहन्तु जनयो योनिमग्रे॥ 7॥ (ऋग्वेद:10.18.7)
एचएच विल्सन द्वारा की गई सातवी ऋचा के अंग्रेजी अनुवाद में कहा गया है कि ऐसी महिलाएं जो विधवा नही है, जिनके पति सुंदर है वे आंखों में घी का काजल लगाकर घरों में प्रवेश करती है। ऐसी महिलाओं को अश्रुविहीन होकर, बिना कोई दुख लिए और आभूषणों से पूरा सज-धज कर अपने घरों में प्रवेश करना चाहिए। डा. वेडी ओ फ्लैहर्टी ने सातवी ऋचा के अनुवाद में बताया है कि ऐसी महिलाएं जो विधवा नही है, जिनके पास सुंदर पति है उन्हें अपनी आंखों में घी का काजल लगाकर अपना स्थान ग्रहण करना चाहिए। बिना आंसू बहाए, बिना कोई कमजोरी प्रदर्शित किए और पूरी तरह से सज-धज कर उन्हें विवाह सूत्र में बंध जाना चाहिए। श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपने अनुवाद में कहा है कि ये सुंदर पति वाली सधवा नारियां घृत युक्त काजल लगाती हुई अपने गृह को प्राप्त हो। ये नारियां आंसुओं को त्यागकर मनोविकारों को दूर करती हुई सुंदर ऐश्वर्य वाली हो कर सबसे आगे चलती हुई अपने घरों को प्राप्त हो। डा. गंगा सहाय शर्मा के अनुवाद के मुताबिक ये सधवा एवं शोभन पत्नियां नारियां घृत और अन्न के साथ अपने घर में प्रवेश करे। ये स्त्रियां आंसुओं के बिना रोगरहित और शोभन धन वाली बनकर अपने घर में सबसे पहले पहुंचे। श्री राधाकृष्ण श्रीमाली और जोधपुर की श्रीमती आशालता उपाध्याय ने अपनी पुस्तक ऋग्वेद में 10.18.7वीं और 10.18.8वीं ऋचाओं का इसी तरह का अनुवाद किया है। इस तरह से विभिन्न जगहों के छह लेखकों का कहना है कि सातवीं ऋचा में उद्धृत महिलाएं विधवा नही है। संक्षेप में यह ऋचा कहती है कि शादीशुदा महिलाओं को सबसे पहले अपने घरों को लौट आना चाहिए। पाठक देख सकते है कि इन लेखकों के मुताबिक सातवीं ऋचा यह नहीं कहती है कि पहले ये पत्‍ि‌नयां चिता में उतरे। इस सातवीं ऋचा का अथर्ववेद के (18.3.57)और (12.2.31) में भी उल्लेख हुआ है।
उदी‌र्ष्व नार्यभि जीवलोकंगतासुमेतमुप शेष एहि।
हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ॥ 8॥
आठवी ऋचा (10.18.8) में एक हिंदू विधवा को लौट करके उसे अपना गृहस्थ जीवन जीने की बात कही गई है। एचएच विल्सन के अनुवाद के मुताबिक हे देवी उठो और जीवित लोगो की दुनिया की तरफ प्रस्थान करो। आओ, जिस आदमी के पास तुम सोयी हो वह जीव रहित हो गया है। तुमने उसकी पत्‍‌नी के रूप में पूरा आनंदमय जीवन गुजारा। यह वही आदमी था, जो तुम्हारा हाथ पकड़कर अपने घर ले गया था। अश्वलायन गृह सूत्र के मुताबिक यह बात मृत पति के भाई या किसी अन्य संबंधी से विधवा को कही जानी है कि ''उठो और घर की ओर लौटो''। डा. वेडी डी ओ फ्लैहर्टी ने अपने अनुवाद में कहा है कि हे महिला उठो और संसार में प्रवेश करो। यहां आओ, तुम उस इंसान के पास लेटी हुई हो, जिसकी प्राण वायु समाप्त हो चुकी है। तुम इस व्यक्ति की पत्नी थी, जो सदा साथ रहने की इच्छा के साथ तुम्हारा हाथ पकड़ कर अपने घर लाया था। पंडित श्री राम शर्मा आचार्य ने इस श्लोक के हिंदी अनुवाद में कहा है कि हे मृतक की पत्नी, तुम्हारा ये पति मृत्यु को प्राप्त हो चुका है। अब तुम इसके पास व्यर्थ बैठी हो। अपने पुत्रादि और घर का विचार करती हुई उठो। तुम इस पति के साथ गर्भ धारण आदि स्त्री कर्तव्य को पूरा कर चुकी हो और तुम उसके प्राण के चले जाने की बात भी जानती हो अत: घर को लौटो। डा. गंगा सहाय शर्मा ने बताया कि हे मृतक की पत्नी, तुम मरे हुए व्यक्ति के पास क्यों सोयी हुई हो? इस पुरुष के पाणिग्रहण व गर्भधारण के अनुरूप आप व्यवहार कर चुके हो। आप इसके साथ मरने का विचार छोड़ो। आर्थर ए मैक्डोनेल ने अपनी पुस्तक 'ए हिस्ट्री ऑफ संस्कृत लिटरेचर' मे भी विधवाओं को संबोधित करते हुए एक प्राचीन वैवाहिक प्रथा के आधार पर उन्हें अपने नये पति का हाथ पकड़ कर खड़ी होने की सलाह दी है। नि:संदेह ही नया पति कोई और नही बल्कि मृत पति का भाई है। अपनी पुस्तक मे मैक्डोनल ने रैल्फ डी आर ग्रिफिथ के (10.18.8)ऋचा के निमन् अनुवाद को उद्धृत किया है - हे मृतक की पत्नी खड़ी हो और जीव-जगत में प्रवेश करो। तुम उस इंसान के साथ लेटी हो जिसकी आत्मा उसे छोड़ कर चली गई है। आओ अब तुम उस व्यक्ति की पत्नी बन चुकी हो, जिसने तुम्हारा हाथ पकड़ने के लिए स्वीकार किया।
इस तरह से विभिन्न स्थानों के 8 अलग-अलग लेखकों ने इस बात को साबित कर दिया कि आठवीं ऋचा मे (10.18.8) विधवाओं से पुन: मानव जगत में लौट कर अपने बच्चों के साथ सामान्य गृहस्थ जीवन जीने और पुनर्विवाह बात की कही गई है। साथ ही यह ऋचा उसके मृत पति की संपत्ति के ऊपर उसका पूरा अधिकार होने की बात भी करती है। 1995 मे उच्चतम न्यायालय ने हिंदू उत्तराधिकार कानून की धारा 14(1) की व्याख्या करते हुए कहा कि किसी मृत इंसान की संपत्ति पर उसकी विधवा पत्नी का पूरा अधिकार होता है। न्यायालय का कहना था कि इसका उद्देश्य हिंदू शास्त्रो द्वारा विधवा महिलाओ पर थोपी गई अयोग्यता के ठप्पे को खारिज करना है। इस तरह से उच्चतम न्यायालय ने 8वी ऋचा द्वारा विधवाओं को दिए गए अधिकारों को फिर से स्थापित किया। यह ऋचा अथर्ववेद (18.3.2)मे भी उद्धृत हुई है।
ऋग्वेद के 10.18.9वी ऋचा में बताया गया है कि विधवा का नया पति उसके मृत पति के हाथ से धनुष या इसी तरह का कोई अन्य हथियार ग्रहण करता है। फिर उससे कहता है कि आओ हम दोनो नया और आनंदमय जीवन की शुरुआत करें और बच्चों को पैदा करके नई ताकत हासिल करे, जिससे शत्रुओं के संभावित हमलों का बचाव किया जा सके। एचएच विल्सन ने अपने अनुवाद में कहा है कि नया पति, मृत पति के हाथ से धनुष ग्रहण करते हुए कहता है कि हम लोगों को पूरी क्षमता, ताकत और ऊर्जा देने के लिए आप स्वर्ग में है। हम जमीन पर रहने वाले लोगों को आप संतानोत्पत्ति का आशीर्वाद दें, जिससे हम अपने शत्रुओ के संभावित हमलो से बचाव कर सके।
आचार्य सायना के मुताबिक ऋग्वेद के दसवे मंडल के 16वे सूक्त की जिन छह ऋचाओ का दाह संस्कार के समय वाचन किया जाता है। इनमे से किसी मे भी विधवाओ को जलाने की बात नही कही गई है। यहां तक कि विधवाओ संबंधी कोई उद्धरण ही नही है।
युवं ह कृशं युवमश्चिना शयुं युवं विधन्तं विधवामुरुष्यथ:।
युवं सनिभ्य: स्तनयन्तमश्चिनाप व्रजमूर्णुथ: सप्तास्यम॥ 8॥ (ऋग्वेद:10.40.8)
मै पाठकों का ध्यान ऋग्वेद की 10.40.8वीं ऋचा की तरफ दिलाना चाहता हूं, जिसमें विधवाओं की रक्षा के लिए अश्विन भगवान की प्रार्थना की गई है। इससे यह बात प्रतीत होती है कि विधवाओं की रक्षा के लिए देवताओ की प्रार्थना की जाती थी। यदि सही मे ऋग्वेद मे विधवाओं के जलाने की बात कही गई होती? तो भला देवता विधवाओ की रक्षा करने कैसे चले जाते, क्योंकि ऐसा करके वे ऋग्वेद का उल्लंघन करते। इसका मतलब है कि ऋग्वेद में ऐसा कुछ नही है।
कुह स्विद्दोषा कुह वस्तोरश्चिना कुहाभिपित्वं करत: कुहोषतु:।
को वां शयुत्रा विधवेव देवंर मर्य न योषा कृणुते सधस्थ आ॥ 2॥ (ऋग्वेद:10.40.2)
एक और ऋचा (10.40.2) ऐसे हिंदुओ को आश्चर्य में डाल देगी, जो गलत ही सही लेकिन इस बात में विश्वास करते है कि हिंदू धर्म में विधवाओं के पुनर्विवाह की इजाजत नही है। एचएच विल्सन ने अपने अनुवाद मे कहा है कि हे अश्विन तुम रात मे कहां थे, तुम दिन मे कहां हो, तुम्हारा समय कहां व्यतीत होता है? तुम्हारा निवास कहां है? जिस तरह से एक विधवा अपने पति के भाई को और सधवा अपने पति को अपने पास बुलाती है उसी तरह कौन है जो तुम पर अपने को कुर्बान करने को तैयार है। डा. वेल्डी डी ओ फ्लैहर्टी के मुताबिक हे अश्विन, तुम शाम को कहां रहते हो, सुबह कहां रहते हो? तुम कहां रुकते हो और रात का वक्त कहां बिताते हो? एक युवती जैसे युवक को या एक विधवा अपने पति के भाई को अपने कमरे में बुलाती है उसी तरह से कौन है जो तुम्हे अपनी तरफ आकर्षित करता है। रैल्फ टीआर ग्रिफिथ के अनुवाद के मुताबिक हे अश्विन तुम शाम को कहां रहते हो, सुबह कहां रहते हो? तुम्हारा निवास स्थान कहां है? रात में कहां रहते हो? एक दूल्हन जैसे दूल्हे को और एक विधवा जैसे अपने पति के भाई को अपनी तरफ आकर्षित करती है उसी तरह से कौन है, जो तुम्हें बुलाता है। डा. गंगा सहाय शर्मा के हिंदी अनुवाद के मुताबिक हे अश्विन कुमार! तुम रात और दिन में कहां रहते हो? जिस प्रकार विधवा अपने देवर को और सधवा अपने पति को चारपाई पर बुलाती है, उसी प्रकार मेरे अतिरिक्त कौन यजमान तुम्हे यज्ञवेदी पर अपने अनुकूल बनाता है। इस तरह से ऋग्वेद न केवल विधवाओं को जिंदा रहने की अनुमति देता है बल्कि अपने देवर से शादी करके बच्चों और पूरे परिवार के साथ सम्मानपूर्ण जीवन जीने की इजाजत देता है। इस तरह से यह विधवाओं को पुनर्विवाह की इजाजत देता है।
अथर्ववेद मे 9.5.27-28वी और 18.3.4वी ऋचा जैसी कई ऐसी ऋचाएं है, जो विधवाओ को पुनर्विवाह का निर्देश देती है। ह्विटनी के अनुवाद के मुताबिक जिस भी महिला के पास पहले पति था उसे बाद में दूसरा पति पाने का पूरा अधिकार है। यदि वे एक बकरी समेत पांच थाल चावल के पंचभोग को दान मे देते है तो उन्हें कभी भी एक दूसरे से अलग नही किया जा सकता है। अथर्ववेद 9.5.28वी ऋचा के मुताबिक उसका दूसरा पति अपनी पत्नी के साथ उसी संसार मे तभी प्रवेश करता है जब वह बकरी और पांच थाल चावल दान करता है।
अथर्ववेद की 18.3.1वी ऋचा विधवाओं को अपने इसी जीवन में बच्चों और संपत्ति के साथ रहने का आशीर्वाद देती है। अथर्ववेद की 18.3.2 वी ऋचा और ऋग्वेद की 10.18.8 वी ऋचा दोनो एक समान है। डब्ल्यूडी ह्विटनी और जोशी के अनुवाद के मुताबिक हे स्त्री तुम जीव जगत मे प्रवेश करो। तुम उसके पास खड़ी हो जिसकी अब मृत्यु हो चुकी है। आओ, अब तुम उसके पास, जो तुम्हारा हाथ पकड़ कर तुम्हे अपनी पत्नी बनाने को तैयार है। अब तुम पति-पत्नी के पवित्र रिश्ते में प्रवेश कर चुके हो। अथर्ववेद की 18.3.3वी ऋचा की व्याख्या के मुताबिक इसमे महिला को मृत्यु से जीवन की तरफ लौट जाने की बात कही गई है। डब्ल्यूडी ह्विटनी के अनुवाद के मुताबिक मैने देखा कि जीवित महिला को मृतक की ओर ले जाया जा रहा है या ले जाया जाने वाला है। इस तरह से वह पूरी तरह से अंधकार (अज्ञानता) मे डूब जाती है। फिर मै उसे सामने से किनारे ले जाता हूं अर्थात अंधकार से उजाले की ओर ले जाता हूं। एक दूसरे लेखक द्वारा अथर्ववेद की 18.3.4 वी ऋचा के किए गए अनुवाद के मुताबिक हे विधवा स्त्री अपने लिए वुद्धिमत्ता के मार्ग का अनुसरण करो और इस दूसरे व्यक्ति का अपने पति के रूप मे वरण करो। उसे खुशी मन से स्वीकार करो और आशा है कि इस संसार मे तुम दोनो को खुशी की सर्वोच्चता होगी। इस ऋचा मे विधवा के लिए अघन्य शब्द का इस्तेमाल किया गया है, जिसका मतलब है कि किसी विधवा की हत्या नही की जा सकती है। जैसे किसी गाय की हत्या नही की जा सकती है उसी तरह से विधवा की भी हत्या नही हो सकती। ऋग्वेद की 10.18.7वी ऋचा के अपने खुद के अनुवाद के ठीक विपरीत पीवी कांणे ने अपनी किताब 'धर्मशास्त्र के इतिहास' मे कहा है कि किसी महिला के लिए पांच स्थितियो मे किसी दूसरे पुरुष को पति के रूप मे हासिल करने का प्रावधान है। इसमे पहला जब पति कही गायब हो गया हो और उसके बारे में कोई सूचना न हो। दूसरा पति की मौत हो गई हो। तीसरा वह नपुंसक हो। चौथा वह सन्यासी हो गया हो और पांचवां वह चरित्रहीन हो गया हो। अग्निपुराण, पारसस्मृति और नारदस्मृति मे भी दूसरे पति के प्रावधान का पूरा उल्लेख है।
ऋग्वेद के तीसरे मंडल को उसका सबसे पुराना हिस्सा माना जाता है। इसकी 3.31.1वी ऋचा मे कहा गया है कि पुत्रहीन होने की स्थिति मे पिता अपनी पुत्री के बेटे को अपनाकर उसे अपना पुत्र का दरजा देता है। पुत्रहीन पिता की सारी संपत्ति का उत्तराधिकारी उसकी पुत्री का बेटा होता है। 3.31.2वी ऋचा के मुताबिक यदि किसी माता-पिता के पास बेटे और बेटी दोनो है तो पिता की मृत्यु के बाद बेटा ही उसका पिंडदान करता है, जबकि भारी मात्रा मे उपहार स्वरूप दान देकर उसकी बेटी को प्रसन्न कर दिया जाता है। साथ ही 2.17.7वी ऋचा मे पिता की संपत्ति मे उसकी पुत्री के भी हिस्सेदारी का प्रावधान है। इसके अलावा ऋग्वेद की 10.27.12वीं ऋचा मे पुत्री को स्वतंत्र रूप से अपना पति चुनने की परंपरा का भी वर्णन है।
काफी ऐसे लोग है, जो ऋग्वेद को तोड़ मरोड़ कर पेश करते हुए 10.18.7वी ऋचा के अंतिम शब्द योमियाग्ने का गलत अर्थ लगाकर इसके सती के पक्षधर होने की वकालत करते है और दूसरी अन्य ऋचाओ को दरकिनार कर देते है। जबकि एचएच विल्सन और पंडित श्री राम शर्मा आचार्य ने संस्कृत के इस शब्द का उच्चारण योमियागरे के रूप मे किया है।
वास्तव में 18वे सूक्त मे मृत आदमी की शरीर को पहले जलाया नही जाता। बल्कि 18वे सूक्त की 11वी, 12वी, 13वी और 14वी ऋचाओं के अनुसार उसे कब्र में दफनाया जाता है। ऐसे में सती समर्थक विधवाओ के किसकी चिता मे जलने की बात करते है जबकि 18वे सूक्त मे उसके पति को कब्र मे दफनाने की बात कही गई है। इसलिए ऋग्वेद में ऐसी कोई ऋचा नही है जिसमें विधवाओ को चिता पर उसके मृत पति के साथ जलने या जलाने की बात कही गई है। इसके उलट ऋग्वेद विधवाओ को अपने नए पति के साथ विवाह करके घर लौटने का आदेश देता है।
मध्य युग के दौरान चर्चो द्वारा डायन घोषित करने के बाद हजारो महिलाओ को यूरोप मे जिंदा जला दिया गया था। मार्क मैसन ने अपनी किताब इन सर्च ऑफ लविंग गॉड मे लिखा है कि यूरोप मे अंधे युग की समाप्ति के बाद बादशाह चारलेमैग्ने ने कथित डायनो के जलाए जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था। नौवी शताब्दी मे चर्च ने इस बात को भी स्थापित किया कि डायनो के पास दैवीय शक्तियां होती है। 1252 मे पोप इन्नोसेट तृतीय ने चर्च की मान्यताओ को न मानने वाले की संपत्ति जब्त करने के साथ ही उन्हे गिरफ्तार करके दंडित करने का आदेश दिया था। हालांकि 1484 मे पोप इन्नोसेट आठवे ने डायन प्रथा को समाप्त करते हुए इस पर निगरानी रखने के लिए एक अधिकारी की नियुक्ति किया। ऐसा अनुमान है कि तीन शताब्दियो के काल मे डायन प्रथा के चलते यूरोप मे लाखो लोगो को प्रताडि़त करने के साथ ही उनकी हत्याएं की गई। इसमे 85 फीसदी महिलाएं थी, जिन्हे जिंदा जला दिया गया। हालांकि दूसरो का दावा है कि 1450 से 1700 के बीच जलाए जाने वालो की संख्या कतई दो लाख से ज्यादा नही थी। वैसे मध्ययुग मे यूरोप मे जलाई गई महिलाओ की संख्या कोई नही जानता। पवित्र कुरान मे भी कई सूरा 2.39, 3.10 और 3.116 जैसे कई स्थानो पर यह कहा गया है कि काफिरो को आग के हवाले कर देना चाहिए। इतिहास की खट्टी यादो को कुरेदने की बजाय हमे आधुनिक युग मे आगे बढ़ते हुए जीयो और जीने दो के साथ ही शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की नीति का पालन करना चाहिए।
हिंदुओ के वेद, रामायण और गीता तीन और केवल तीन सर्वोच्च धर्मग्रंथ है। ब्राह्मण, उपनिषद, पुराण, धर्म शास्त्र और सूत्र जैसे दूसरी अन्य लोगो द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर लिखी गई टिप्पणियां और व्याख्याएं है। जैसे की भारत के संविधान पर लिखी गईं टिप्पणियां उसके अनुच्छेदो का स्थान नही ले सकतीं है। अथवा संसद और विधायिकाओ द्वारा पारित कानून भी संविधान के अनुच्छेदो की जगह नही ले सकता है। उसी तरह से व्यक्तियो द्वारा वेदो पर लिखी गई टिप्पणियां या उसकी व्याख्याएं भी वेदो की ऋचाओ या रामायण और भगवद्गीता का स्थान नही ले सकती है। महर्षि वेदव्यास ने खुद महाभारत में निर्देश दिया है कि अंतर्विरोध पैदा होने पर वेद सारे लेखों पर प्रभावी होगा।
श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते।
तत्र श्रौतं प्रमाणन्तु तयोद्वैधे स्मृति‌र्त्वर॥
ऐसी स्थिति में जबकि स्मृतियो एवं पुराणो तथा वेदों के बीच मान्यताओं को लेकर कोई अंतरविरोध पैदा होता है तो उसमे वेदो मे लिखी गई बात प्रभावी होगी। रामायण मे सब लोग जानते है कि दशरथ की मृत्यु के बाद उनकी किसी भी पत्नी से चिता पर जलने के लिए नही कहा गया। उल्टे सारी रानियो ने परिवार मे पूरे सम्मान के साथ अपना जीवन व्यतीत किया। साथ ही भगवान राम ने हमेशा विधवा माताओ के चरणो मे अपना सिर नवाया। महाभारत मे भी पांडवो की मां कुंती विधवा होने के बाद सती नही हुई। साथ ही वह अपने पूरे जीवनभर पारिवारिक मामलो मे सक्रिय भूमिका निभाती रही। भगवान श्रीकृष्ण तक उन्हे सम्मान देते रहे। यदि सती होना धर्म की जरूरत रही होती तो धर्मराज युधिष्ठिर अवश्य अपनी विधवा माता कुंती से सती होने को कहते। युधिष्ठिर ने कभी ऐसा नही किया इसका मतलब है कि विधवाओ का सती होना धर्म की जरूरत नहीं थी। इस तरह से रामायण और गीता मे विधवाओ के सती होने का कोई प्रावधान नही है।
शताब्दियो से संपत्ति के लिए एक रिश्तेदार दूसरे रिश्तेदार की हत्याएं करते रहे है और यह सब आज भी जारी है। लालच मानव का स्वभाव है। यदि लालची लोग किसी विधवा का सोना, चांदी और उसकी भूमि हड़प करने के लिए उसे अपने पति की चिता के साथ सती हो जाने के लिए कहते है तो इसका मतलब हमे यह नही समझ लेना चाहिए कि ऋग्वेद या हिंदुत्व इसकी इजाजत देता है। 10.18.3वी ऋचा हिंदू विधवा के मृतक से अलग होने का आदेश देती है जबकि 10.10.8वी ऋचा उसके जिंदा घर लौटकर अपने बच्चो और परिवार के साथ सुखी जीवन व्यतीत करने की इजाजत देती है। इसके साथ ही 10.18.9वी ऋचा मृतक पति के भाई के साथ या किसी अन्य जीवित व्यक्ति से उसकी तुरंत शादी करने का आदेश देती है। अपने अधिकार के लिए हिंदू महिलाओ को 2.17.7वी, 3.31.1वी, 3.31.2वी, 10.18.3वी, 10.18.8वी, 10.40.2वी और 10.40.8वी जैसी सात ऋचाओ को याद रखने की जरूरत है। इन ऋचाओ के माध्यम से ही उन्हें हिंदू समाज और न्यायालयों में अपने बराबरी का वैदिक अधिकार प्राप्त हो सकते है।

(लेख मे व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार है। इससे भारत सरकार को कोई लेना देना नही है।)