सती प्रथा का निषेध करता है वेद
 
 
गो मांस: वेद, चिकित्सा विज्ञान और भ्रांतियां
 
 
वेद व हिन्दू पुस्तकों में जातिवाद का कोई स्थान नही
 
 
श्रीमद् भागवत गीता भी जात-पात का निषेध करता है
 
 
वेद और हिंदू धर्मशास्त्रो द्वारा जातिवाद का निषेध
 
 
   
श्रीमद् भागवत गीता भी जात-पात का निषेध करता है
ओ.पी. गुप्ता, फिनलैड मे भारत के राजदूत

श्रीमद् भागवत गीता मे जन्म के आधार पर चार वर्णो के उल्लेख को लेकर जातियो के समर्थक दो श्लोको (5.13 व 18.41) का प्राय: उदाहरण दिया करते है। आइए इसकी पड़ताल करे। श्लोक (4.13) में भगवान श्रीकृष्ण कहते है, 'चर्तुवर्णयम् माया श्रीष्टाम् गुणकर्म विभागसा' अर्थात् गुण और कर्म के आधार पर मेरे द्वारा समाज को चार वर्णो मे विभक्त किया गया है। भगवान कृष्ण पिछले जन्म के गुण व कर्म के बारे मे नही कहते। श्लोक (18.41) मे भगवान कृष्ण कहते है, 'ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र च परमतपा, कर्माणि प्रभिक्तानि स्वाभवप्रभावेगुणिया।' इसका अर्थ है वर्तमान जीवन मे लोगो को कर्म व स्वभाव के आधार पर चार वर्णो मे विभक्त किया गया है। श्रमिको को चार वर्गो-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र-मे विभक्त किया गया है, जो मनुष्यो की स्वाभाविक प्रकृति पर आधारित है। क्या यह विभक्तिकरण जन्म पर आधारित है? कदापि नहीं,क्योकि भगवान कृष्ण ने श्लोक (18.41) मे ही इसके लिए मुहावरे का प्रयोग किया है-'कर्माणि प्रविभक्तानि।' श्लोक (18.42) मे भगवान कृष्ण ने ब्राह्मण की जो परिभाषा निर्धारित किया है, उसमें कहा गया है कि वह स्वयं तो वेदो का अध्ययन करे ही साथ दूसरो को अपने ज्ञान से लाभान्वित करे। वह व्यक्ति जिसने वेदो को नही पढ़ा, न ही दूसरो को वेद पढ़ाया है, वह ब्राह्मण की परिभाषा पूर्ण नहीं है।
ब्राह्मणत्व को वैसे ही अपने प्रयास से प्राप्त किया जाता है, जैसे वर्तमान मे एम ए एमबीबीएस आदि की डिग्री प्राप्त करते है। जन्म के आधार पर एक शिक्षक के पुत्र को शिक्षक, एक इंजीनियर के पुत्र को इंजीनियर नही कहा जा सकता है, उसी प्रकार से एक आईएफएस अधिकारी के पुत्र को आईएफएस अधिकारी नहीं कहा जा सकता है, जब तक की वह यूपीएससी की परीक्षा पास न कर ले। अत: ब्राह्मण वही जो जो कि गीता में वर्णित परिभाषा को पूरा करे। गीता के अनुसार कोई भी जन्म से ब्राह्मण नहीं है। भगवान कृष्ण ने श्लोक (18.42) मे साफ शब्दो मे कहा है कि हिंदू धर्म एक मिशनरी धर्म है। ब्राह्मणो (शिक्षित वर्ग) का एक कर्तव्य है कि वह दूसरो को वेद पढ़ाए और उसे प्रचारित करे। बाबा साहब भीमराव अंबेदकर पहले लेखक थे जिन्होने मुझे सोचने के लिए विवश किया कि हिंदू धर्म एक मिशनरी धर्म है। श्लोक (18.68) व श्लोक (18.69) में भगवान श्रीकृष्ण ने पुन: पंडितो की जाति आधारित मिशनरी कर्तव्य का उल्लेख करते हुए कहा है कि एक धार्मिक ध्वज के तले सबो के बीच सद्भाव कायम रखना हमारा व्यावहारिक कर्तव्य है, जिसका हमे अवश्य पालन करना चाहिए। इस्लामिक कानून के तहत, कोई भी, जो मुस्लिम को काफिर बनने का प्रयास करता है, उसकी हत्या करने की बात कही गई। फिरोज शाह तुगलक (1351-88) ने वैसे हिंदू पंडितो को जिंदा जलाने का आदेश दिया जिसने मुसलमानो को हिदू बनाने की कोशिश की। इस्लामिक कानून के तहत इस प्रकार की सजा ने हिंदू पंडितो को स्थायी रूप से एक मिशन के रूप मे कार्य न करने के लिए विवश किया। इस्लामिक कानून के तहत अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए हिंदू पंडितो के लिए यह आवश्यक हो गया कि वे मुसलिम शासनकाल मे अपनी मुहिम को विराम दे दे। इस कारण काजियो द्वारा चलाए जा रहे न्याय प्रशासन मे हिंदुओं का विरोध बन्द सा हो गया। इसके विपरीत ब्रिटिश काल के दौरान आर्य समाज ने पूर्व मे इस्लाम धर्म कबूल करने वालो के लिए 'शुद्धि' का कार्यक्रम शुरू किया था। लेकिन मुख्य समस्या यह रही है कि हिंदू पंडितो ने आजादी के बाद भी स्वयं को राजनीति और हिंदुओ के वृहत्तर कल्याणार्थ किसी कार्य से स्वयं को जाने अनजाने अलग रखा, जैसा कि उसके पूर्वज मध्यकालीन मुसलिम शासको के दबाव मे करते आए थे। आज भी बहुत ऐसे लोग है, जो पंडितो को सांसारिकता से दूर रहने की सलाह देते है। ऐसे लोगो का मानना है कि हिंदू पंडित इस प्रकार व्यवहार करते रहें जैसे मानो वो मुसलिम शासको के अंतर्गत रह रहे हो। वे यह चाहते हैं कि आज जिस प्रकार की समस्याओ से हिंदू समाज जूझ रहा है, उसमे हिंदू पंडित निरपेक्ष रहे। इसी संदर्भ मे मुनि वशिष्ठ, परशुराम, द्रोणाचार्य आदि के उदाहरणों द्वारा हिंदू पंडितो को सलाह दी कि वे समाज मे अपनी महती भूमिका निभाएं। खासकर आजादी के बाद यदि मुल्ला व पादरियो के समसामयिक विषयों पर मसजिदों एवं गिरिजाघरों में व्याखान देना उनकी दैनंदिनी मे शामिल है, तो फिर क्यो केवल हिंदू पंडित इससे अलग रहे। इसलिए यह उचित समय है कि हिंदू पंडित मध्यकालीन सोच से उबरे और हिंदू समाज के पुनर्निर्माण के लिए जीन-जान से जुटें। कुछ लोग कहते है कि कैथोलिक पोप की तरह हिंदुओ मे कोई पोप नही है, लेकिन ऋग्वेद के उपदेश (10.191) के अनुसार, हम जातिवाद के खिलाफ लड़ने के लिए किसी एक को तैयार कर और सबो को उसकी अगुवाई मे एक धार्मिक बैनर के तले एकत्रित कर सकते है। गीता के दो श्लोक हिन्दू धर्म के मिशनरी रूप की पुष्टि करते है-
य इमं परमं गुह्यं मद्रभक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय: ॥ गीता (18.68)
(केवल वही लोग, जो सबसे ज्यादा मुझे चाहते है, जो मेरे भक्तो के बीच गीता के उपदेशो को प्रचारित करते है, मेरे सबसे करीब होते है। यह निर्विवाद सत्य है। )
न च तस्मान्यनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृतम:।
भविता न च मे तस्मादन्य प्रियतरो भुवि॥ गीता (18.69)
(समूचे सृष्टि मे ऐसे लोगों द्वारा मेरी सबसे बड़ी सेवा है, उस सेवा का मुकाबला कोई दूसरा नही कर सकता और ऐसे लोग ही मेरे सबसे प्रिय होगे, उतना प्रिय कोई दूसरा नहीं होगा।)
श्लोक (10.20) मे भगवान कृष्ण ने कहा है, 'अहमात्मा गुडाकेसा सर्वभूता सयस्थिता:' अर्थात, 'हे अर्जुन! मै सर्वव्यापी व सबो के हृदय मे विद्यमान हूं।' यहां, भगवान स्वयं शूद्र मानव के हृदय मे भी विराजते हैं। श्लोक (18.61) मे भगवान ने कहा है, 'ईश्वराह सर्वभूतानाम हृदयेशर्जुना तिष्ठति' अर्थात अर्जुन! भगवान सभी जीवित मानवो के हृदय मे विराजते है।' फिर, शूद्र इससे अलग नही है।
श्लोक (14.4) मे भगवान कृष्ण कहते है, 'हे अर्जुन! भौतिक जगत मे संपूर्ण प्रकृति गर्भधारण करने वाली मां है, जबकि मै बीज देने वाला पिता हूं।' इस प्रकार भगवान कृष्ण बताते है कि वह एक शूद्र के पिता भी है, जैसे अन्य हिंदुओ के।
श्लोक (16.18) मे भगवान कृष्ण कहते है, 'जो लोग अहं, क्रूरता, घमंड आदि दुर्गुणो को अपने शरीर मे स्थान देते हैं और इसका इस्तेमाल दूसरो पर करते है, वो वस्तुत: मुझसे घृणा करते है।' इस प्रकार भगवान कृष्ण साफ शब्दो मे यह उपदेश देते है कि एक हिंदू को दूसरे हिंदू से कदापि घृणा नही करनी चाहिए। इस प्रकार गीता छूआछूत का निषेध करता है। गीता के एक अन्य श्लोक (16.9) मे भगवान कृष्ण कहते है, 'लोगो मे ऐसे घृणा करने वाली पापी, क्रूर लोगो को मै बार-बार असुर योनि मे जन्म लेने के लिए अभिशापित करता हूं।' श्लोक (15.20) मे भगवान कृष्ण कहते है, 'ऐसे हिंदू कभी मेरे पास नही आते, अर्थात मोक्ष नही प्राप्त करते, हे अर्जुन! ऐसे लोग जन्म जन्मांतर के चक्रव्यूह मे फंसकर लगातार निमन् योनियो मे गिरते चले जाते है।'
श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नर:।
सोअप मुक्त शुभॉंल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥ गीता (18.71)
उपरोक्त श्लोक मे भगवान कृष्ण शूद्रो सहित सभी हिंदुओ के लिए अपना दरवाजा खुला रखने की बात करते हुए कहते है, वह मनुष्य जो पवित्र गीता के उपदेशो को आदर के साथ सुनता है वह पुण्यात्मा श्रेष्ठ एवं शुभलोक मे प्रवेश पाता है। इसलिए मनुस्मृति या गौतम सूत्र कैसे शूद्रो को वेद या गीता को सुनने के लिए प्रतिबंधित कर सकता है। श्लोक (5.18) मे भगवान कहते है, 'मोक्ष चाहने वाले बुद्धिमान एक ब्राह्मण (जो ज्ञान व संस्कृति के जानकार होते है), एक गाय और एक चंडाल के प्रति समान दृष्टि अपनाते है।' अत: जो शूद्र को हेय दृष्टि से देखते है वे न तो बुद्धिमान है और न ही मोक्ष प्राप्त कर सकते है। श्रीमद् वाल्मीकि रामायण मे भी कहा गया है कि जो (शूद्र सहित) इसका पाठ करते है वे महानता व सभी क्षेत्रो मे उन्नति की प्राप्ति करते है।
पठन् द्विजो वागृषभत्वमीयत् स्यात् क्षत्रियो भूमिपतित्वमीयत्।
वणिग्जन: पुण्यफलत्वमीयाज्जानश्च शूद्रोअपि महलवमीयात्॥
इस प्रकार वेद, गीता व रामायण शूद्रों के लिए इसके पाठन के अधिकार को मान्यता प्रदान करते हैं। रामायण मे भगवान राम ने स्वयं रामभक्त हिंदुओ क ेलिए दो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। जिसे प्रत्येक वर्ष रामलीला मे भक्तो के समक्ष प्रस्तुत किया जाता रहा, लेकिन हमने इससे सीख नहीं ली और इसी कारण हम विदेशियो से मात खाते रहे। रावण ऋषि पुलत्स्य का पोता था। वह वेद का ज्ञाता भी था। इसलिए, मनुस्मृति के मुताबिक वह जन्म से ब्राह्मण था और उसी प्रकार से उसने शिक्षा भी प्राप्त की, लेकिन उसके परिवार के कई सदस्य गलती के कारण भगवान राम के हाथो मारे गए। इसलिए, रामायण की पहली शिक्षा यह है कि कानून के समक्ष सभी (किसी भी जाति व स्तर के लोग) एक समान है। 14 वर्ष के वनवास के दौरान भगवान राम सबरी (एक शूद्र महिला) के यहां गए, उसे माता कहकर पुकारा और उसके द्वारा चखे गए जूठे बैर को भी ग्रहण किया। इसी प्रकार से एक निषाद (शूद्र) ने जरूरत के समय भगवान राम को नदी पार कराया था। इस प्रकार रामायण की दूसरी शिक्षा है कि सच्चे रामभक्तो को अनुसूचित जाति/जनजाति/दलित हिंदुओ के घर जाने व उनके साथ खाने मे संकोच नहीं करना चाहिए। उदाहरणार्थ, महात्मा गांधी ने मन, वचन व कर्म से रामायण की शिक्षा को आत्मसात किया, जिस कारण वे युगपुरुष कहलाए।
कई एसी/एसटी/दलित हिंदू न केवल इन तीनो प्रमुख धार्मिक ग्रंथो के जानकार थे, अपितु उन्होने इसके लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान भी दिया। इनमे ऋषि कवास इलूसू, ऋषि वत्स, ऋषि काकसिवत, महर्षि वेदव्यास, महर्षि महिदास अत्रैय, महर्षि वाल्मीकि के नाम प्रमुख है।
अत: कोई भी इस बात से इनकार नही कर सकता कि अनुसूचित जाति/जनजाति/दलितो के पूर्वजो ने हिंदू धर्म व संस्कृति मे महत्वपूर्ण योगदान किया। साथ ही अन्य वर्गो द्वारा प्रताडि़त करने पर इन्हे भी अपने पूर्वजो से मिले विरासत का सम्मान करते हुए उससे पलायन नहीं करना चाहिए। इन्हें अपने बराबरी के अधिकार प्राप्ति के लिए उपरोक्त वैदिक ऋचाओं एवं गीता श्लोकों का बौद्धिक धरातल पर अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए।

(लेख मे व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार है। इससे भारत सरकार को कोई लेना देना नही है।)