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वेद और हिंदू धर्मशास्त्रो द्वारा जातिवाद का निषेध
ओ.पी. गुप्ता, फिनलैड मे भारत के राजदूत
जातिवाद से संबंधित संघर्ष भारत मे आए दिन होता ही रहता है। हाल ही मे 2 अक्टूबर 2002 मे झज्जार के दूलीना मे पांच दलित हिंदुओ की हत्या और दलितो द्वारा जयपुर के चकवारा गांव मे तालाब के उपयोग को ले कर फैले तनाव के विषय पर तमाम अखबारो ने किसी न किसी को जिम्मेदार ठहराते हुए खूब लिखा। दलितो के खिलाफ इस तरह के व्यवहार के विरुद्ध इन्होने दलितो के इस्लाम, ईसाई, या बौद्ध धर्म मे चले जाने को उचित ठहराया। झज्जार और सेलायूर(चेन्नई) मे बौद्ध संस्था द्वारा धर्मपरिवर्तन सभा का आयोजन भी किया गया। जबकि 28 नवंबर 2002 को अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग ने अपनी रिपोर्ट मे कहा कि दूलीना कांड का मुख्य कारण जाति आधारित आक्रोश नही था जिसे धर्मातरण लॉबी मुख्य कारण के रूप मे प्रचारित कर रही थी। धर्म या धर्मपरिवर्तन जीवन साथी चुनने के समान ही बिल्कुल व्यक्तिगत मामला है और जब तक इसका व्यक्तिगत स्थान पर तथा व्यक्तिगत स्तर पर आचरण होता है, राज्य को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नही है। अर्थात सामूहिक धर्मातरण का पूरे ताम-झाम के साथ सार्वजनिक स्थल पर आयोजन भारतीय दंड संहिता के तहत दंडनीय (ब्रीच ऑफ पीस) है।
हिंदू धर्म मे जाति पर आधारित कुप्रथाओ के विरुद्ध सुधार का पहला चरण स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, डा. अंबेडकर, संत फूले, श्री नारायण गुरु, बस्वेस्वर और वरकरी जैसे महापुरुषो द्वारा चलाया गया। इनकी कुछ अनुशंसाओ को संविधान मे भी शामिल किया गया तथा इसके मद्देनजर कानून भी बनाया गया। सुधार के दूसरे चरण मे हिंदू समाज के लिये आवश्यक है कि वह निचले स्तर तक जन्म के आधार पर लोगो मे समानता के सिद्धांत को मान ले। संभवत: जाति से संबंधित समस्याओ का यही उचित निदान होगा, न कि जाति पर आधारित संघर्ष या धर्मातरण। धर्मातरण के बारे मे तमिलनाडु सीपीएम के सचिव एन वर्धराजन ने लिखा है कि इसका मुख्य कारण दलितो के साथ बरता जाने वाला सामाजिक भेदभाव और उनकी बेइज्जाती है। इसी लाइन पर स्व. श्री मोती लाल ने इंडियन एक्सप्रेस मे लिखा था कि जातिवाद की समस्या के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण इसके खिलाफ सार्थक आंदोलन का न होना है।
अंबेडकर के अनुसार जाति एक ही नस्ल के व्यक्तियो का सामाजिक विभाजन है। इनकी यह स्वीकारोक्ति कि हिंदू समाज की सभी जातियां मानव के एक नस्ल से ही संबंध रखती है, वेद की 15 वी ऋचाओं से मेल खाती है, खास कर यजुर्वेद के 26:02 से। अंबेडकर का यह विचार था कि जाति हिंदुओ के लिए हमेशा हानिकारक सिद्ध हुई है। इस जातिप्रथा के कारण हिंदुओ को निरंतर पराजय का सामना करना पड़ा। जाति ने हिंदू को भारत का बीमार व्यक्ति बना दिया। जाति प्रथा ने हिंदू नस्ल को बर्बाद कर दिया तथा समाज को मूल्यविहीन बना दिया। इससे आगे बढ़कर आंबेडकर ने कहा कि जाति प्रथा के कारण ही धर्मातरण के मार्फत दोबारा हिंदू धर्म मे आना दुश्वार हो गया है क्योकि व्यक्ति को यह पता नही होता है कि हिन्दू धर्म में परिवर्तन के बाद उसे किस जाति मे स्वीकार किया जाएगा। उन्होने तो यहां तक कहा कि जाति प्रथा ने हिंदू धर्म की स्वयंसेवा की भावना को खत्म कर दिया है।
ऋग्वेद का पुरुष सूक्त चार वर्ण की चर्चा करता है लेकिन जन्म पर आधारित जाति की नही। मनुस्मृति ने चालाकी से इस चार वर्ण को जन्म पर आधारित चार जाति मे बदल दिया तथा ऐसी चालीस मिश्रित जातियो के बारे मे जानकारी दी जो रक्त से संबंधित थे। हालांकि मनुस्मृति ने सामाजिक स्तर पर घुलने-मिलने की छूट दी लेकिन यह केवल शादी-ब्याह के माध्यम से ही संभव हो सकता था। हिंदुओ को विभाजित रखने के उद्देश्य से ब्रिटिश राज मे उनके कर्मचारियो द्वारा हिंदुओ को तकरीबन 2,378 जातियो मे विभाजित कर दिया गया। इतना ही नही 1891 की जनगणना मे केवल चमार की ही लगभग 1156 उपजातियो को रिकार्ड किया गया। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज तक कितनी जातियां-उपजातियां बनाई जा चुकी होगी। हालांकि शतपथ ब्राह्मण, परास्कर गृह, और बुद्धायन धर्म मे अंतरजातीय विवाह की अनुमति है लेकिन ऊंची और नीची जाति के मनुवादी बोध ने इस अवधारणा को निरुत्साहित किया। मनुस्मृति के जातिवाद ने हिंदुओ को सैन्य स्तर पर भी कमजोर कर दिया। मनुस्मृति तथा उसके समकालीन स्मृतिकारो के मुताबिक शूद्रो (श्रमजीवी वर्ग) को गांव के बाहर रहना चाहिए, इस तरह उन्हे सैन्य, राजनीति और सरकारी मामलो से अलग रखा गया। वैश्यो से यह आशा की जाती थी कि वे व्यापार, कृषि और पशुपालन से ही वास्ता रखेगे इस तरह इन मामलो से उन्हे भी अलग रखा गया। ब्राह्मणो ने पहले ही घोषणा कर दिया कि हथियार और सैन्य मामलो से उनका कोई संबंध नहीं है। इस तरह मनु की व्यवस्था के तहत समाज के बड़े वर्ग (तकरीबन 75 प्रतिशत) को मानसिक रूप से सैन्य मामलो मे अक्षम एवं राजनीतिक स्तर पर निष्क्रिय बना दिया। युद्ध केवल क्षत्रियो का कर्तव्य माना गया एवं उनसे यह आशा की जाती थी कि वे सेना मे जाएं। यदि यह मान लिया जाए कि समाज मे 25 प्रतिशत क्षत्रिय थे। उनमे 12.5 प्रतिशत महिलाओ को निकालने के बाद बाकी बचे पुरुषो मे भी एक तिहाई बच्चे और एक तिहाई बूढ़ो को छांट दिया जाए तो इस मनुवादी व्यवस्था के तहत केवल तीन प्रतिशत लोगो की देश के लिए लड़ने की नैतिक जिम्मेदारी होती है। इस मनुवादी व्यवस्था के अनुसार यदि किसी हिंदू समाज की संख्या 10,000 है तो इसमे से केवल 300 सैनिक ही प्राप्त हो पाता जबकि इसी संख्या मे किसी दूसरे धर्म वाले (इस्लाम या क्रिश्चन) हो तो उन्हे 3000 या उससे अधिक सैनिक काफिरो से लड़ने के लिए उपलब्ध होगा। इस कारण से बावजूद संख्या मे अधिक होने पर भी हिंदू अल्पसंख्यक तुर्क मंगोल, अफगान, एवं मुगल आक्रमणकारियो से हारते रहे है। इनकी पत्नियो के साथ बलात्कार हुआ, मंदिरो को तोड़ा गया तथा इन्हे घसीट कर हजारो मील दूर काबुल ले जाया गया जहां इन्हे दास बनाकर रखा गया। इस विषय मे विशेष जानकारी की चाहत रखने वालो को प्रो. के एस लाल की पुस्तक मुस्लिम स्लेव सिस्टम इन मिडायबल इंडिया को जरूर पढ़ना चाहिए। मिडाइवल स्लेव ट्रेड इन इंडिया मे संध्या जैन ने भी भारत मे दास प्रथा के बारे मे लिखा है। ड्रिक क्लोफ ने साफ तौर पर मुगल राज कर्मचारियो द्वारा हजारो-हजार की सख्या मे कृषकों को दास के तौर पर निर्यात की सूचना दी है। इस दिशा मे 1660 के दशक मे पर्सिया की मांग पर भारत से दासो के निर्यात की घटना पर ध्यान दिया जा सकता है। इसकी पुष्टि उस समय के आंकड़ो से भी होती है। मसलन,तपन राय और इरफान हबीब ने अपनी पुस्तक द कैब्रिज इकोनामिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया मे लिखा है कि 1600 से 1800 ईस्वी के बीच भारत की जनसंख्या वृद्धि दर काफी कम, लगभग 0.14 प्रतिशत के आसपास था। आखिर इतने कम अनुपात मे जनसंख्या के बढ़ने का निहितार्थ क्या है?
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(लेख मे व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार है। इससे भारत सरकार को कोई लेना देना नही है।)
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