सती प्रथा का निषेध करता है वेद
 
 
गो मांस: वेद, चिकित्सा विज्ञान और भ्रांतियां
 
 
वेद व हिन्दू पुस्तकों में जातिवाद का कोई स्थान नही
 
 
श्रीमद् भागवत गीता भी जात-पात का निषेध करता है
 
 
वेद और हिंदू धर्मशास्त्रो द्वारा जातिवाद का निषेध
 
 
   
वेद और हिंदू धर्मशास्त्रों द्वारा जातिवाद का निषेध
ओ.पी. गुप्ता, फिनलैड मे भारत के राजदूत

जातिप्रथा के इस बुराई से हिंदू समाज वेद और सनातन धर्म (गीता) का अनुसरण कर निजात पा सकता है, और साथ-साथ अपनी राजनीतिक और सैनिक कमजोरी से भी। इसका उदाहरण भी हमारे पास है, जब गांधी जी ने अस्पृस्यता के विरोध में आंदोलन शुरू किया उसी समय यह देश राजनीतिक मुक्ति की ओर भी अग्रसर होना शुरू हुआ। आजादी के बाद जब भारतीय संविधान का निर्माण हुआ तो उसमे जन्म एवं लिंग के आधार पर समानता के वैदिक विचार को जगह दी गई और उसका सुफल हमारे सामने है। मुट्ठि भर विदेशी आक्रमणकारियो से भी पराजित हो जाने वाला यह देश अपने अतीत को नकारते हुए आजादी के बाद से कभी नही हारा है। हमारी सेना ने 1971 के युद्ध मे जीत के साथ-साथ दुश्मन के हजारो सैनिकों युद्धबंदी बनाया था। हम आजादी के बाद से दासता वाली स्थिति मे कभी नही आए हैं, बल्कि अब पूरी दुनिया मे हमारे देश को आदर से देखा जाता है। मात्र पचास वर्ष के छोटे से समय मे ही भारत विश्व की चार बड़ी अर्थ व्यवस्था वाले देश मे शुमार हो गया है। अब भारत परमाणविक शक्ति संपन्न देश हो गया है जिसके पास अपनी सेटेलाइट, डिजिटल टेलेमेट्री, तथा मिसाइल प्रणाली है। विश्व विकास रिपोर्ट के अनुसार सन 2001 मे भारत की कुल क्रय शक्ति 2913 यू एस डॉलर के लगभग है। जो क्रमश: अमेरिका, चीन और जापान के बाद सबसे अधिक है। जी-20 के सदस्य देश के तौर पर भारत को आमंत्रित किया गया था। भारत अब आइएमएफ और विश्व बैक के दान दाता देश की श्रेणी मे आ गया है। अंबेडकर ने सही ही विश्लेषण किया था कि जाति मानसिक अवस्थिति है, एक अवधारणा है। इसकी समाप्ति का मतलब एक देश की मानसिक रूपरेखा मे उल्लेखनीय बदलाव है। अंबेडकर के अनुसार हिंदू जातिवाद को इसलिए प्रश्रय देते है क्योकि उनका यह मानना है कि यह धर्म का आवश्यक अंग है। जातिवाद की समाप्ति के लिए अंबेडकर वैदिक मान्यता तथा उसकी दैविक सत्ता का खात्मा आवश्यक मानते थे। वे खुद इसे समाप्त करने मे असफल रहे तथा अंतत: 1956 मे बौद्ध धर्म के अनुयायी हो गए। वे मानने लगे थे कि धर्म के परंपरागत श्रोत-वेद को हिंदू नकार नही पाएंगे। मेरे हिसाब से जातिवाद से छुटकारा पाने के लिए सबसे पहले तो हमे मनुस्मृति को वेद के समकक्ष रखने की गलती नही करनी चाहिए, दूसरे समाज मे लोगो को यह समझाना होगा कि शुरुआती धर्मशास्त्रो मे इसका प्रावधान नही था तथा यह भी कि वेदो मे जातिवाद की वकालत नही की गई है। बल्कि यह हिंदू धर्म विरोधी है। जातिवाद ऐसा कचरा है जो सदियो की अशिक्षा व अन्य कारणो से असली हिंदू धर्म के आसपास लग गया है। हालांकि इसके उन्मूलन के लिए किसी भी तरह की सोशल इंजिनीयरिंग या जाति युद्ध की जरूरत नही है। इसके लिए ईमानदारी से वेद की 25 ऋचाओ तथा श्रीमद्भागवत गीता के तेरहवे श्लोक का अनुसरण, तथा श्रीराम द्वारा स्थापित दो आदर्श का अनुकरण आवश्यक है। साथ ही ऊंची जाति के हिंदुओ को यह समझाने की जरूरत है कि यदि वे मनुस्मृति के अनुसार जातिवाद को मानते है तो यह वैदिक मान्यताओ का उल्लंघन है तथा पाप है। इन वैदिक मान्यताओ के खिलाफ जानबूझ कर कोई भी हिंदू आचरण नही करेगा क्योकि वेद, भगवान श्री राम और कृष्ण की शिक्षा के विरुद्ध जाकर कोई भी श्राप का भागी नही बनना चाहेगा। अस्पृश्यता के खिलाफ लड़ते हुए गांधीजी ने जाति प्रथा उन्मूलन की दिशा मे अपनी ओर से पूरा प्रयास किया। हिंदुओ मे एकता बनी रहे, इसके लिए उन्होंने 21 दिनो का उपवास किया तथा दलितो को (पूना पैक्ट) यह आश्वासन भी दिया कि उन्हे ब्रिटिश शासन मे मिलने वाले सीट से अधिक सीट दिया जाएगा। ऋगवैदिक काल के बाद मनु एक ऐसे ऋषि हुए जिन्होने हिंदू समाज को बांट कर उसके एक बड़े भाग को दासता के लिए अभिषप्त कर दिया वही दूसरी तरफ गांधीजी एक ऐसे संत साबित हुए जिन्होने ऋग्वैदिक मनसा,वाचा और कर्मणा स्वयंसेवा की भावना का अनुसरण करते हुए हिंदू समाज को एक सूत्र मे पिरोने का महान कार्य किया। तथा इस तरह उन्होने हिंदू समाज को राजनतिक स्वतंत्रता और आजादी के लिए प्रेरित किया। हालाकि गांधीजी मुस्लिम लीग का मूल्यांकन करने तथा उसके साथ उचित व्यवहार करने मे असफल रहे। पुजारियो को वेद के 38 ऋचा और उनके श्लोकों के बारे मे बताना चाहिए। साथ मे यह भी कि अस्पृश्यता का आचरण वेद, गीता और भगवान श्री राम द्वारा स्थापित आदर्शो के खिलाफ है। यह आम तौर पर दखा गया है कि मुस्लिम बंधु सुन्नाह मे लिखित मुहम्मद साहब के आदर्शो का उल्लंघन नही करते है। जबकि आम हिंदू भगवान श्रीराम के जीवन चरित को अपने जीवन मे नही उतार पाता है। जैसा कि चकवारा(राजस्थान) के हिंदुओ ने गांव के बैरवा जाति के हिंदुओ को तालाब का पानी लेने से रोक कर किया। इन वैदिक आदर्शो के आलोक मे जब कभी भी मै पुरोहितो से बाते करता हूं तो बहुत आहत होता हूं। उनमे से अधिकांश को न तो संस्कृत का ज्ञान होता है ना ही उन्होने कभी वेद पढ़ा है, बस उन्हे कुछ मंत्र और श्लोक याद है जिसके आधार पर वे कर्मकांड करवाते है। वे यह अपेक्षा करते है कि आज के हिंदू धर्म के अलंबरदार कहे जाने वाले लोग यदि उन्हे सही शिक्षा दे फिर वे वेद की सही शिक्षा को फैलाने वालो मे सबसे आगे होगे। वे इसके लिए दलितो एवं आदिवासियो के घर-घर जाने के लिए भी तैयार है क्योकि उन्हे पता है कि इससे उनकी आमदनी बढ़ेगी, लेकिन इस दिशा मे वे झिझक के कारण कदम नही उठा पाते है। दूसरी तरफ पानी पी-पी कर केवल पंडितो और ब्रह्मणो को गाली देने से भी यह समस्या समाप्त होने से रही, आखिर इस समस्या रुपि बिल्ली के गले घंटी कौन बांधेगा? इसके लिए कुछ सकारात्मक कदम उठाने होगे, मसलन- मंदिरो को होने वाली आय के एक भाग को पुरोहितो की शिक्षा पर व्यय किया जाए। एक ऑल इंडिया हिंदू पुजारी सर्विस की शुरुआत करनी चाहिए जिसके तहत हिंदू समाज के ऐसे सदस्यो को लिया जाए जिन्हे इस विधा की उचित जानकारी हो। इस दिशा मे मननीय उच्च न्यायालय हमारे धार्मिक और सामाजिक नेताओ से आगे सोचते हुए यह निर्णय दिया है कि मंदिरो मे बतौर पुजारी नियुक्ति के लिए किसी भी जाति के योग्य व्यक्ति को लिया जा सकता है। साथ ही यह भी व्यवस्था की कि मंदिरो के कार्यालय का पद अनुवांशिक न हो। अक्तुवर 02 मे उच्चतम न्यायलय ने यह निर्णय दिया कि ब्रह्मण जाति के बाहर के व्यक्ति भी किसी मंदिर का पुरोहित बनने की योग्यता रखते है बशर्ते कि उन्हे सभी मंत्रो एवं रिति-रिवाजो की सही जानकारी हो। न्यायालय कायह दोनो निर्णय का हिंदू धर्म की आत्मा से इत्तेफाक रखता है। डा. आंबेडर ने काफी पहले ही कहा था कि यदि पुराहिती को जातिवाद के आडंबरो से मुक्त करना है तो ऐसा व्यवस्था हो जिसके तहत निर्धारित जांच प्रक्रिया को पार करने के बाद ही किसी को पुरोहित का दर्जा प्राप्त हो, और आखिरकार न्यायालय ने उनके विचार पर मुहर लगा ही दिया।

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(लेख मे व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार है। इससे भारत सरकार को कोई लेना देना नही है।)